आख़िर क्यू?
आख़िर क्यू कई बार,
बात जबां पे आके रुक जाती है,
आख़िर क्यू कुछ कही – अनकही यादें,
मन को इतना विचलित कर जाती है,
क्यू दिल की बात कहने से,
अक्सर डर लगता है,
क्यू ये ख्वाब,
भरी रातो को जगता है?
आख़िर क्यू मन,
खुद के सवालो मे उलझा सा है,
आख़िर कैसे ये जीवन,
किसीकि ख़यालो से उलझा सा है?
क्यू बात – बात मे,
कल की फ़िक्र सताती है,
क्यू हर बात पे,
बीते लम्हो की याद आती है?
आख़िर क्यू अब दिल को,
सपनो की कोई चाह नही होती,
आख़िर कैसे हर सपने से मंज़िल तक,
कोई राह नही होती?
क्यू फिर जाने,
मन नये ख्वाब सजाने लगा है,
क्यू कुछ सपनो के टुकड़ो से,
ये अपनी नयी राहे बनाने लगा है?
आख़िर क्यू अक्सर,
दिल रोने को करता है,
आख़िर क्यू अक्सर,
खुद रोने से डरता है?
क्यू जान कर भी बातें अक्सर,
दिल अंजान बनता है,
क्यू खोकर अपना वजूद,
कोई नई पहचान बनता है?
आख़िर क्यू रास्ते ज़िंदगी के,
कुछ आसान नही होते,
आख़िर क्यू अब ख्वाबो मे मेरे,
आसमान नही होते?
क्यू मै मन की बातें,
जहाँ से कह नही पता,
क्यू अक्सर इस जहाँ मे,
खुद को इतना अकेला पाता?
आख़िर क्यू चेहरे के नक़ाब,
मुझे सॉफ दिखते है,
आख़िर क्यू जहाँ मे,
सपनो पे लोग बिकते है?
क्यू चेहरा आज,
मन से ज़्यादा बिकने लगा है,
क्यू जो उसका ना था कभी,
आज उसी का दिखने लगा है?

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