नई ख़ूबसूरती
वो ख़ूबसूरती अलग थी ;
जो आँखों की हवस से परेह , दिल की तम्मन्ना थी ;
जो दुनिया को दिखाने से ज़्यादा, हमारी खुदकी हमनवा थी ;
यक़ीनन … वो ख़ूबसूरती अलग थी ।
वो दीवानगी अलग थी ;
जो जिस्मो से ऊपर , रूह की तलाश में हुआ करती थी ;
जो मंज़िल से ज़्यादा , दर्द के इकरार में हुआ करती थी ;
वो दीवानगी अलग थी।
पर ना जाने क्युँ ………
खो गयी है वो बेइन्तेहाँ मोहब्बत अब कहीं ।
जो दिखता है आँखों को , यहाँ बस वही बिकता अब सही।
यहाँ इश्क़ का सच्चा इल्म , अब कोई होनहार समझता नहीं ,
कहाँ गयी वो बेइंतेहा मोहब्बत जो हुआ करती थी यहीं।
उसी बेइन्तेहाँ मोहब्बत की खोज का अब हर इंसान को इक सुरूर है ,
पर उस खोज में आपके साथ , ये कलम मेरी ज़रूर है।।
Designer: Pratyay

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